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एप्सटीन फाईले

सत्ता पूंजी और लोकतांत्रिक नैतिकता का अंधेरा कोना

एपस्टीन फ़ाइलें: सत्ता, पूँजी और लोकतांत्रिक नैतिकता का अँधेरा कोना

यह आलेख किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का दावा नहीं करता। इसका उद्देश्य निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को सार्वजनिक विवेक के केंद्र में लाना है, जिन्हें अक्सर “राष्ट्रीय हित”, “कूटनीतिक गोपनीयता” या “व्यापारिक संवेदनशीलता” के नाम पर हाशिए पर धकेल दिया जाता है। लोकतंत्र में यही प्रश्न-जागृति उसकी नैतिक रीढ़ होती है।

1. एपस्टीन फ़ाइलें: अपराध से आगे का सवाल

Jeffrey Epstein का नाम अब केवल एक यौन-अपराधी तक सीमित नहीं रहा। उपलब्ध दस्तावेज़ों, अदालती फाइलों और मीडिया जाँचों में उसका व्यक्तित्व एक ऐसे मध्यस्थ के रूप में उभरता है, जो धन, सत्ता और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के संगम पर खड़ा था। यह तथ्य निर्विवाद है कि वह वैश्विक राजनीति, वित्त और अभिजात वर्ग के अनेक शक्तिशाली लोगों के संपर्क में था। विवाद का बिंदु यह नहीं कि कौन दोषी है, बल्कि यह है कि:

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* क्या निजी पूँजी और सत्ता के बीच ऐसे अनौपचारिक रास्ते बनते रहे हैं जिन पर कोई लोकतांत्रिक निगरानी नहीं थी?
* क्या “नेटवर्किंग”, “मार्केट एक्सेस” और “बैक-चैनल डिप्लोमेसी” की भाषा कभी राष्ट्रीय हित से ऊपर रखी गई?

2. सत्ता की निकटता और पारदर्शिता का प्रश्न

एपस्टीन फ़ाइलों में जिन नामों या संदर्भों का उल्लेख हुआ—चाहे वे अंतरराष्ट्रीय हों या भारतीय संदर्भ से जुड़े—वे अदालती सत्य नहीं, बल्कि सार्वजनिक जिज्ञासा के विषय हैं। लोकतंत्र में सत्ता के निकट कोई भी व्यक्ति या संस्था स्वतः ही सार्वजनिक जाँच के दायरे में आ जाती है। यह किसी का अपमान नहीं, बल्कि सार्वजनिक पद और प्रभाव की स्वाभाविक कीमत है।

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि कोई दोष सिद्ध हुआ या नहीं, बल्कि यह है कि:

* क्या विदेश-नीति, रक्षा, बड़े व्यापारिक सौदों या रणनीतिक निर्णयों में किसी निजी, अनौपचारिक या संदिग्ध मध्यस्थ की भूमिका संभव थी?
* यदि नहीं, तो क्या सरकारें और संस्थाएँ उस संभावना को स्पष्ट रूप से खारिज करने के लिए पर्याप्त पारदर्शिता दिखा रही हैं?

3. “थ्रेट डील” बनाम व्यापारिक सौदे

आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यापार और कूटनीति का घनिष्ठ संबंध है। लेकिन यही घनिष्ठता तब खतरनाक हो जाती है, जब:

* सौदे लोकतांत्रिक संस्थाओं से बाहर तय हों,
* निर्णय चुनिंदा व्यक्तियों के निजी नेटवर्क पर निर्भर हों,
* और जवाबदेही किसी निर्वाचित या संवैधानिक संस्था के बजाय निजी प्रभाव-क्षेत्रों में सिमट जाए।

यदि किसी भी स्तर पर व्यापारिक सौदे “थ्रेट डील”—अर्थात दबाव, ब्लैकमेल या नैतिक समझौतों—में बदलते हैं, तो यह केवल नैतिक विफलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन जाता है।

4. न्यायालय और नागरिक समाज: अलग-अलग भूमिकाएँ

यह स्पष्ट करना आवश्यक है:

* न्यायालय प्रमाण तय करते हैं, दोष सिद्ध करते हैं या बरी करते हैं।
* नागरिक समाज और मीडिया प्रश्न पूछते हैं, प्रक्रियाओं की जाँच करते हैं और भविष्य के लिए चेतावनी देते हैं।

इन दोनों भूमिकाओं को मिलाना या एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना लोकतंत्र को कमजोर करता है। एपस्टीन फ़ाइलों के संदर्भ में भी यही संतुलन ज़रूरी है—न तो भीड़ का फैसला, न ही सत्ता की चुप्पी।

5. भारत के लिए सबक: संस्थागत आत्मरक्षा

भारत जैसे लोकतंत्र के लिए यह प्रकरण किसी विदेशी गॉसिप से अधिक है। यह हमें याद दिलाता है कि:

* विदेश-नीति और बड़े आर्थिक निर्णय संस्थागत प्रक्रियाओं से ही हों,
* किसी भी निजी व्यक्ति की “एक्सेस” या “नेटवर्क” नीति का विकल्प न बने,
* और पारदर्शिता को राष्ट्र-विरोध कहकर खारिज न किया जाए।

सच्चा राष्ट्रहित प्रश्नों से डरता नहीं, बल्कि उनसे मज़बूत होता है।

## शोर नहीं, सजगता

एपस्टीन फ़ाइलें हमें कोई अंतिम सत्य नहीं देतीं, लेकिन वे एक चेतावनी ज़रूर देती हैं—कि सत्ता, पूँजी और गोपनीयता का गठजोड़ यदि बिना निगरानी के चलता रहे, तो लोकतंत्र भीतर से खोखला हो सकता है।

इस आलेख का आग्रह सीधा है:

* आरोप नहीं, जवाबदेही।
* हंगामा नहीं, पारदर्शिता।
* निर्णय नहीं, सतत् प्रश्न।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति यह नहीं कि सवाल पूछे जाएँ—सबसे खतरनाक स्थिति यह है कि सवाल पूछना ही देशद्रोह मान लिया जाए।

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